Jat Dharm Introduction (जाट धर्म परिचय)

प्रिय धर्मज्ञ जनों,
संस्था द्वारा एतिहासिक साहित्य शोध से जनसाधारण को सृष्टि के प्रारम्भकाल और वर्तमान, सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक विड्डतियों द्वारा जागृत जातिवाद के जातीय परिवर्तन से मुक्ति दिलाने में सर्वधर्म एकता विग्रह सूत्र न्याय, कर्म, सत्य श्रनेजपबम.।बजपवद.ज्तनजी का जाट ज्ञान उपदेश जिससे महाभारत में योगीराज श्रीड्डष्ण ने अर्जुन को विजय श्री दिलायी थी, के मर्म, पर ट्रस्ट अपने मार्ग प्रशस्त कर रहा है। ट्रस्ट द्वारा जातीय सांस्ड्डतिक परिवर्तनों पर कराये गये सर्वेक्षण से ज्ञात हुआ है कि दिल्ली के 500 कि.मी. क्षेत्र की जनता के वचारों में ब्राह्मण वर्ग 80% ठाकुर, राजपूत वर्ग 90% अन्य वर्ग 50%, जाट धर्म जागृति व जाट जाति से सबको ईर्ष्या है। जाट जाति के बाहुल्य क्षेत्र से पता चला है कि वह स्वयं नहीं जानते जाट धर्म क्या है। अपने आप को हिन्दू धर्मी कहते हैं, जबकि जाट धर्म पुरुषों का हिन्दू धर्म से सर्वदा विरोध में 3-6 का आंकड़ा रहा है। धर्म पुरुषों का हिन्दू धर्म से सर्वदा विरोध में 3-6 का आंकड़ा रहा है। सर्वेक्षण में पाया गया है कि हिन्दू धर्म के बहुधर्म सूत्र ‘‘पूजा’’ को छोड़कर जाट अन्य हिन्दू धर्म के किसी भी सूत्र को आज भी नहीं मानता है। अपितु कमाल इस बात का है कि जाट अपने आप को हिन्दू कहता है। अतः अति संक्षेप में जाट धर्म, शब्द परिचय श्रवण करें।

प्रियधर्मज्ञ, जिज्ञासू एवं धर्म भीरूओं,

आधुनिक मानव समाज में पदच्युत जाट धर्म को पुनः स्थान तभी प्राप्त होगा जब प्राचीन भारतीय शिक्षा का विकास होगा। कालान्तर से चला आ रहा जाट शिक्षा का अभाव व जातिय द्वेषता से धर्म आडम्बरों का तांडव नृत्य, मानव विकास की प्रगति में भौतिकता का घिनौना जीवन एवं आधुनिक शिक्षा और मीडिया से पौराणिक सांस्ड्डतियों की ड्डतिम विक्रति ने जाट धर्म और जातीय अनुयाईयों की संतति के हृदय में जाट शब्द की हीनता का अंकुर पैदा कर दिया है। जाट संतति को जाट शब्द के प्रयोग में ऐसी लज्जा का आभास होता है जैसे वैश्या संतति में पाया जाता है । जाट का हृदय अपने आप को जाट कहने में वैसे ही कॉपता है, जैसे देश में आज से तीन हजार वर्ष पूर्व ब्राह्मण शासक अर्जुन गौड के शासन काल में उसके अत्याचारों से भयभीत होकर जाट धर्मी कांपा करते थे । तीन हजार वर्ष से चला आ रहा जाट शिक्षा का पतन जब तक जागृत रहेगा तब तक जाट जातिय और धर्म का भूतल पर धार्मिक स्थान नहीं बन पायेगा।

मानव कल्याण की जाट जाति में भगवान!

शोध के आधार से भूतल पर सभी धार्मिक स्थल जाट ज्ञान दर्शन पर बने हुए हैं। देश में भगवान के 23 अवतार जाट जातीय में हुए हैं। जाट धर्म द्रोहियों के जातिवाद से पैदा किए गये आडम्बरों के द्वारा धर्मग्रन्थों में परिवर्तन करके जाट धर्म शिक्षा और देश के इतिहास से जाट शब्द को अदृश्य करने के लिए हिन्दू धर्म की स्थापना की गई थी। आर्य और हिन्दू धर्म की परिकाष्ठा से ईशाई धर्म की स्थापना हुई और अनेक धर्म आडम्बरों से तिरस्ड्डत होकर हजरत मौŒ साहब ने कुरान शरीफ ग्रन्थ की रचना की थी। सरदार जाट धर्म पुरुषों के पोषक गुरु गोविन्द सिंह जी को हिन्दू धर्म अनुयायिओं द्वारा 350 वर्ष पूर्व काशी में अपमानित किया और विधर्मियों द्वारा देश की जाट संस्ड्डति को नष्ट किये जाने पर ऑगई स्टेट, बल्देव, मथुरा के जाट सनातनी आर्य पुरुषों ने ;बंचारी, पंजाब हरियाणाद्ध के जाट कुल में दृष्टि हीन जन्मे ब्रह्मर्षि बृजानंद जी मथुरा के परामर्श पर महर्षि दयानंद को सहयोग प्रदान कर मथुरा से 18वीं शदी के अंत में कुॅŒ हुकम सिंह जी रईस ऑगईने आर्य समाज की स्थापना कराके देश विदेश की सम्पूर्ण जाट रियासतों को आर्य समाज से सम्बन्धित करवाया था और जातिवाद धर्म आडम्बरों से विलुप्त जाट शिक्षा परिवर्तनों के कारण आज की 90ः¯ जनता जाट शब्द से परिचित नहीं है। वेदों को उत्पन्न करने वाला सृष्टि के प्रारम्भ काल से भूतल पर जाट सनातन धर्म जाग्रत था। वही जाट धर्म ब्राह्मणों के पाखण्ड से आज अलोप है। कालान्तर में परस्पर कुछ कारणों से जाट धर्म को परिभाषित एवं नियमित करने के लिए त्रेता के द्वितीय चरण में भगवान के प्रथम अवतार सम्राट पृथु के शासन काल में जाट धर्म की संस्ड्डति को संग्रहित कर सूत्र रूप से चार आचार संहिताओं में समाहित किया था। वह जाट हृदय चारों आचार संहिताएं आज के समाज में धर्म आचार संहिताएं आज के समाज में धर्म आडम्बरों की देन से श्री ब्रह्मा के चारों मुखों से उत्पन्न वेद कहलाती है। जाट शिक्षा के पतन में वेद की आत्मा जाट ज्ञान के मर्म से जनता- जनार्दन अनविज्ञ है। हिन्दू धर्म पोषक संन्यासी व ब्राह्मणों के आडम्बरों का प्रचार प्रसार और धर्म में किये गये परिवर्तनों से जाट शिक्षा का पतन हुआ है। विद् धातु से वेद शब्द है, उसी प्रकार जट् धातु से जाट शब्द है। वेद (विद्या) शिक्षाओं क ज्ञान भंडार और जाट जगत की सृष्टि का मूलाधार है। जब मूलाधार नहीं तो विद्याओं का जन्म कैसे हुआ अतएव जाट तथा जगत की उत्पत्ति का ज्ञान प्राप्त करना बहुत अनिवार्य है। महाभारत में योगीराज श्रीकृष्ण अर्जुन को जाट ज्ञान की शिक्षा नहीं देते, तो आज के इतिहास में महाभारत शब्द तक नहीं मिलता। यु( के 36 वर्ष बाद तक विश्व स्तर पर योगीराज श्रीकृष्ण ने जाट धर्म का प्रचार प्रसार किया है। जगत की संस्ड्डति और धर्म ग्रन्थों में एक मात्र जाट ज्ञान-विज्ञान दर्शन के उपरांत और कुछ नहीं है। उत्थान-पतन में ब्राह्मण धर्म आडम्बरों से वर्गवाद, जातीयवाद पैदा हुआ है। उस असामाजिक प्रदूषण से प्रभावित शासकों के इतिहासकार तथा उनके धर्म गुरूओं ने इतिहास, धर्म शास्त्र, ग्रन्थों में स बड़ी चतुराई के साथ परिवर्तन कर जाट शब्द को अलोप कर दिया है । परन्तु अध्ययन करता जन और कल्याणकारी पुरुष, वास्तविक स्वरूप को अपने शोध मार्ग द्वारा प्राप्त कर लेते हैं। जिज्ञासु जनों, अपने प्रियजनों के साथ मानव कल्याण के धर्म क्षेत्र में विचरने से पूर्व जगत को धारण करने वाली जाट शक्ति की भक्ति से गुजरना होगा। ड्डपया पहले जाट स्वरूप के दर्शन ज्ञान को धारण करें। जगत की रचन कब हुई इसका सही - सही पता अब तक नहीं लग पाया है अपितु हमारे वेद और शास्त्रों के विद्वान तथा विज्ञान विदों ने करीब-करीब अपने शोध द्वारा वेद से चार अरब बत्तीस करोड़ वर्ष व जाट प्रभू अवतार से वर्तमान सृष्टि 1972945117 वर्ष तथा जाट राज्य स्थापना से 12,05,33117 (बारह करोड पॉंच लाख तेतीस हजार एक सौ सत्तरह वर्ष) पूर्व का समय निर्धारित किया है।



Vishwa Jat Maha Sangh, Jatdham, Vrindavan (Mathura) UP
Government of India Ministry of Home Recognized no. 136570021
Meditational Religious Research & Charitable benevolent, Vountary Trust

लेख शब्द

प्रियसज्जनों!
जाट क्षत्रिय वंश इतिहास शोध ग्रंथ, जाट रईस घराना आँगई द्वारा स्थापित ट्रस्ट विश्व जाट महासंघ के मुख्य सचिव डा0 कुं0 राम प्रताप सिंह जी ने परिवार से प्राप्त चार सौ वर्ष के विचार और अपने 80 वर्ष के परिाश्रम से वेद-शास्त्र एवं हजारों वर्ष पूर्व के इतिहास तथा एतिहासिक महापुराणों से और विदेशी विधर्मि इतिहास कारो के ग्रन्थों से कलेवर लिया है। वर्तमान के प्रचलित किसी जाट इतिहास अथवा किसी वेबसाईट से शोध ग्रंथ में किसी प्रकार से किसी के इतिहास में से अतिक्रमण का कोई अंश नहीं है।

महाभारत काल से मुगल काल तक की घटित घटना एवं प्रगट जाट क्षत्रियों के वर्णन व धार्मिक ग्रन्थों के प्रमाण तथा प्रमाणों से उत्पन्न एतिहासिक घटित घटनाओं द्वारा देश पर अतिक्रमण कारियों के साथ जाट यु( की घटित घटना अंग्रेज शासन काल तक का सूत्र रूप से वर्णन है। शोध कार्य चल रहा है। साधन अभाव में गति शुष्म है। ‘द्वितीय खण्ड’ वर्तमान के जाट इतिहास का प्रारम्भ हो रहा है। प्रचीन संस्कृति के राज्य वर्णन उनके लेख इतिहासों से तथा पूर्व के राज वंशों का वर्तमान प्रजातंत्र में स्थान। वर्तमान के जाग्रत तथा दैदिप्त मान जाटों का प्रमाणित स्वरूप और देश विदेशों मंे उनके स्थान कीर्ति का वर्णन होगा। अतः जाट जनता अपने अपने वंश, गोत्र, वैभव छवि और संस्कृति का साझा कर सकती है। कृपया दृण संकल्प के साथ प्रेषित करें।



प्रथम भाग का संक्षिप्त सार

प्रिय सज्जनों!
प्रियधर्मज्ञ, जिज्ञासू एवं धर्म भीरूओं।
आधुनिक मानव समाज में पदच्युत जाट धर्म को पुनः स्थान तभी प्राप्त होगा जब प्राचीन भारतीय शिक्षा का विकास होगा। कालान्तर से चला आ रहा जाट शिक्षा का अभाव व जातिय द्वेषता से धर्म आडम्बरों का तांडवल नृत्य, मानव विकास की प्रगति में भौतिकता का घिनौना जीवन एवं आधुनिक शिक्षा और मीडिया से पौराणिक सांस्कृतियों की कृतिमक विक्रति ने जाट धर्म और सजातिय अनुयाईयों की संतति के हृदय में जाट शब्द की हीनता का अंकुर पैदा कर दिया है। जाट संतति को जाट शब्द के प्रयोग में ऐसी लज्जा का आभास होता है जैसे वैश्या संतति में पाया जाता है। जाट का हृदय अपने आप को जाट कहने में वैसे ही कापता है, जैसे देश में आज से तीन हजार वर्ष पूर्व ब्राह्मण शासक अर्जुन गौड के शासन काल में उसके अत्याचारों से भयभीत होकर जाट धर्मी कांपा करते थे। तीन हजार वर्ष से चला आ रहा शिक्षा का पतन जब तक जाग्रत रहेगा। तब तक जाट जाति और धर्म का भूतल पर धार्मिक स्थान नहीं बन पायेगा। जाट द्रोहियों की संतती के हृदय से हीनता और व्याप्त द्वैष्ता को मिटाने के लिए जाट संतती को ब्राह्मणभय के स्वरूप का विकल्प अपनाना पडेगा। जिस अमोघ अस्त्र से पाखन्डियों ने धर्मशास्त्र और धार्मिक ग्रन्थों से जाटों के एश्वर्य को समाप्त किया है।

प्रथम भाग का संक्षिप्त सार

प्रिय सज्जनों!
प्रियधर्मज्ञ, जिज्ञासू एवं धर्म भीरूओं।
आधुनिक मानव समाज में पदच्युत जाट धर्म को पुनः स्थान तभी प्राप्त होगा जब प्राचीन भारतीय शिक्षा का विकास होगा। कालान्तर से चला आ रहा जाट शिक्षा का अभाव व जातिय द्वेषता से धर्म आडम्बरों का तांडवल नृत्य, मानव विकास की प्रगति में भौतिकता का घिनौना जीवन एवं आधुनिक शिक्षा और मीडिया से पौराणिक सांस्कृतियों की कृतिमक विक्रति ने जाट धर्म और सजातिय अनुयाईयों की संतति के हृदय में जाट शब्द की हीनता का अंकुर पैदा कर दिया है। जाट संतति को जाट शब्द के प्रयोग में ऐसी लज्जा का आभास होता है जैसे वैश्या संतति में पाया जाता है। जाट का हृदय अपने आप को जाट कहने में वैसे ही कापता है, जैसे देश में आज से तीन हजार वर्ष पूर्व ब्राह्मण शासक अर्जुन गौड के शासन काल में उसके अत्याचारों से भयभीत होकर जाट धर्मी कांपा करते थे। तीन हजार वर्ष से चला आ रहा शिक्षा का पतन जब तक जाग्रत रहेगा। तब तक जाट जाति और धर्म का भूतल पर धार्मिक स्थान नहीं बन पायेगा। जाट द्रोहियों की संतती के हृदय से हीनता और व्याप्त द्वैष्ता को मिटाने के लिए जाट संतती को ब्राह्मणभय के स्वरूप का विकल्प अपनाना पडेगा। जिस अमोघ अस्त्र से पाखन्डियों ने धर्मशास्त्र और धार्मिक ग्रन्थों से जाटों के एश्वर्य को समाप्त किया है।


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